दुनिया को जीतने का गुर सिख लेना…प्रदीप शर्मा

सर उठा के शान से जीने का गुर सीख लेना
परिंदों से उड़ने का हौसला
दरिया से मौजों की रवानी का शोर सीख लेना
कभी न डरना, गरजते सिंघो से भी
भरत की तरह उनके दाँतों को गिन पाने गुरुर सीख लेना
हिमाला से अडिग अपने व्यक्तित्व उजाले से
हिमगिर से भी हो ऊँचा, वो शिखर चूम लेना
पर कभी वक्त मिले अकेले में
खुद से बतियाने का
अंतर्मन में अपनी आँखों से आँखे मिला कर
खुद के गिरेबाँ में झांकना
जो खुद को हारा हुआ पाओ तो
फिर से उठना, संभलना और भी निखरना
खुद से हार कर मेरे दोस्त
“दुनिया को जीतने का गुर सिख लेना”

6 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 24/09/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 24/09/2016
  3. C.M. Sharma babucm 24/09/2016
  4. Kajalsoni 24/09/2016
  5. Radhe प्रदीप शर्मा 24/09/2016

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