उमर ख़ैयाम की रुबाइयों का फारसी से हिन्दी में अनुवाद-2

बैठ, प्रिय साक़ी, मेरे पास,
पिलाता जा, बढ़ती जा प्यास!
सुनेगा तू ही यदि न पुकार
मिलेगा कैसे पार?

स्वप्न मादक प्याली में आज

डुबादे लोक लाज, जग काज,

हुआ जीवन से, सखे, निराश,

बाँध, निज भुज मद पाश!

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