मंदिर से मस्ज़िदों से मैं दूर भागता हूँ

मंदिर से मस्ज़िदों से में दूर भागता हूँ
दिल मोम-सा है लेकिन पत्थर तराशता हूँ

रहबर नहीं हूँ लेकिन रहजन भी मैं नहीं हूँ
मेरे साथ चल के देखो मंज़िल का रास्ता हूँ

हीरे की कलम काँच के जिस्मों पे तुम चलाओ
मैं काँच की क़लम से हीरों को काटता हूँ

मैं इश्क़ का पुजारी तुम्हें बुतकदे से यारी
मैं आदमी मैं उसकी सूरत तलाशता हूँ

आँखों में ख़्वाब लेकर गैरों के ऐ “तपिश” वो
सो ही गए हैं लेकिन फिर भी मैं जागता हूँ

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