ज़िन्दगी तल्ख़ सही फिर भी बहुत प्यार किया

ज़िन्दगी तल्ख़ सही फिर भी बहुत प्यार किया
मौत भी आई न वादे पे इंतज़ार किया

अपनी परछाई पे उनसे यकीं किया न गया
हमने गैरों की मसीहाई पे एतबार किया

लोग चलते हैं रक़ीबों से बचा के दामन
मेरा दामन तो दोस्तों ने तार-तार किया

ग़ैर कह के चलो अच्छा किया के भूल गए
कम से कम इक नमाज़ी को ही मैख़्वार किया

हमने तौबा तो गुनाहों से की “तपिश” लेकिन
फिर तेरी चाह ने तौबा को गुनहगार किया

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