दम तोड़ रही इंसानियत – अनु महेश्वरी

कहने को छू आए चाँद हम,
पर पड़ोसियों से रहें अंजान हम।
बढ़ती आबादी के साथ,
दम तोड़ रही इंसानियत।

पूरी करने अपनी ख्वाइशें,
इधर उधर सब दौड़ रहे।
इकठ्ठा किया मनोरंजन का सामान,
पर खोया मन का चैन।

वो भी एक जमाना था,
पूरा मुहल्ला अपना हुआ करता था।
आज घर में भी सब एक दूसरे से दूर है,
सबको करनी अपने मन की है।

दोस्ती फेसबुक पे सिमटने लगी,
शाम बिताने को सच्चा दोस्त नहीं।
रिश्तो से मासूमियत अब खोने लगी कही,
न ही अपनापन है और न ही भावनाएं रही।

भेड़चाल सब चलने लगे,
बुद्धिमत्ता कही खोने लगी।
न जाने किसकी नज़र लगी,
न जाने किसकी नज़र लगी।

‘अनु माहेश्वरी’
चेन्नई

2 Comments

  1. babucm babucm 14/10/2016
    • ANU MAHESHWARI Anu Maheshwari 14/10/2016

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