सरकारी काम-II

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छट गया था अंधियार, ………………….,
………………………,क्यूँ की दिन था “शीतलेश” मंगलवार,
हो करके मैं घर से तैयार, ………………,
चला निपटाने कुछ सरकारी काम,

छट गया था अंधियार, ………………….,
………………………,क्यूँ की दिन था “शीतलेश” बुधवार,
………………………,क्यूँ की दिन था “शीतलेश” गुरुवार,
………………………,क्यूँ की दिन था “शीतलेश” शुक्रवार,

छट गया था अंधियार, चलने लगी थी मंद बयार,
चिड़ियों ने गाया अपना गान, लो हो गया है प्रातः काल,
था मेरा मनपसंद का वार, क्यूँ की दिन था “शीतलेश” शनिवार,
हो करके मैं घर से तैयार, हाँथ में छाता, फाईलो का भार,
चला निपटाने कुछ सरकारी काम,

फिर खड़ी थी लम्बी कतार, आने न वाली थी मेरी बार,
बाबू को बुलाया इस पार, दिया निकाल एक नोट हजार,
झटपट हो गया मेरा काम, कहा घर जाकर अब करो आराम,
पांच मिनट का था ये काम, पांच दिनों से सुख चैन हराम,
इसे ही कहते है सरकारी काम,

जाते जाते बाबू ने चार पंक्ति सुनायी:-
चप्पल-जूते घिस जायेंगे, जीना हो जायेगा दुश्वार,
फाईल तब तक नही सरकेगी, जब तक ना हो नोटों का भार,
ऐसे ही चलता सरकारी दफ्तर, इसे ही कहते है “सरकारी काम”…

शीतलेश थुल 

8 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 19/09/2016
    • शीतलेश थुल शीतलेश थुल 20/09/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 19/09/2016
    • शीतलेश थुल शीतलेश थुल 20/09/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 19/09/2016
    • शीतलेश थुल शीतलेश थुल 20/09/2016
  4. Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 19/09/2016
    • शीतलेश थुल शीतलेश थुल 20/09/2016

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