सरकारी काम-I

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छट गया था अंधियार, चलने लगी थी मंद बयार,
चिड़ियों ने गाया अपना गान, लो हो गया है प्रातः काल,
था मेरा मनपसंद का वार, क्यूँ की दिन था “शीतलेश” सोमवार,
हो करके मैं घर से तैयार, हाँथ में छाता, फाईलो का भार,
चला निपटाने कुछ सरकारी काम,

पहुंचा जब सरकारी दफ्तर, खड़ी थी वहाँ लम्बी कतार,
जिसमे आधे से ज्यादा लोग, लग रहे थे बेरोजगार,
होकर वो एक-दूजे पे सवार, बढ़ाते रहे पंक्ति अपार,
मेरी फाईल कैसे जाये पार, निस्तब्ध खड़ा सोचू इस पार,
आने ना वाली थी मेरी बार, हो गया आज भी दिन बेकार,
फिर भी खड़ा बन के वफादार, इन्च प्रति घंटा बढे कतार,
तर-बतर पसीने से सारे सरोबार, फिर भी हटने को कोई ना तैयार,

मेरी हिम्मत को ना आये करार, और अब कितना सहेगा मेरे यार,
होने ही वाला था मध्यकाल विराम, आने ना वाली थी मेरी बार,
सरकारी बाबू था जानकार, देखा उसने मेरी जेब के पार,
पास आ कहने लगा निकाल हजार, हो जायेगा तेरा काम,

पैसा देने को ना मैं तैयार, बनने लगा मैं होशियार,
कर लूँगा मैं अपना काम, पर हो गया था अल्प-विराम,
अल्प-विराम से पूर्ण विराम, आने ना वाली थी मेरी बार,
बज उठा छुट्टी अलार्म, हो न सका सरकारी काम,
बीत चूका था सोमवार, नम्बर आयेगा अगली बार…

continue….

6 Comments

    • शीतलेश थुल शीतलेश थुल 20/09/2016
  1. babucm babucm 19/09/2016
    • शीतलेश थुल शीतलेश थुल 20/09/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 19/09/2016
    • शीतलेश थुल शीतलेश थुल 20/09/2016

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