आज का इंसान

इंसान झूझ रहा है जिंदगी से,
दो गज जमीं और कफ़न के लिए,
पता है सबको अंतिम दिशा वही है,
फिर भी अंजान बना है ऐसे,
जैसे रहना यहाँ है उसको
युगयुगान्तर के लिए।
इंसान झूझ रहा है जिंदगी से,
दो गज जमीं और कफ़न के लिए।।
बना लिया है मशीन खुद को,
पैसा कमाने के लिए,
वक्त नहीं है आज इंसान के पास,
अपने ही परिवार वालों के लिए।
इंसान झूझ रहा है जिंदगी से,
दो गज जमीं और कफ़न के लिए।।
सुकुन खो रहा है हर इंसा यहाँ,
सुकून पाने के लिए,
हर रोज मर रहा है वो तो
यहाँ जीने के लिए।
इंसान झूझ रहा है जिंदगी से,
दो गज जमीं और कफ़न के लिए।।
By:Dr Swati Gupta

9 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 19/09/2016
    • Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 20/09/2016
  2. Kajalsoni 19/09/2016
    • Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 20/09/2016
  3. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma (bindu) 19/09/2016
  4. शीतलेश थुल शीतलेश थुल 19/09/2016
    • Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 20/09/2016
  5. C.M. Sharma babucm 19/09/2016
    • Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 20/09/2016

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