“” नया सबेरा””

“”दिल के अरमानों ने कर ली है खुदखुशी शायद
बरसात की बूँदों ने जी भर है रो ली शायद।

गुनाहों की टहनियों पे लटका हुआ हूँ
ऐसा लगता है पथ से भटका हुआ हूँ।

मंजिल की राह का कुछ पता नहीं
मत कोस किस्मत तू खुद को , इसमें तेरी कोई खता नहीं।

भटकते -गुजरते उस बेसकीमती राह को ढूँढना ही होगा
जहाँ से मेरे लिए कल इक नया सबेरा होगा..”!!!!

5 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 17/09/2016
  2. C.M. Sharma babucm 17/09/2016
  3. mani mani 17/09/2016
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 17/09/2016

Leave a Reply