लालसा

मैं आज सुनाने आया हूँ, जो अन्तर्मन ने गाया है,

जो भूली बिसरी यादों को कोरे कागज पर लाया है।

किलकारी  वो  कहाँ खो गयी आँगन और दलानों की,

था खेल रहा दिन  भर जिस पर वो नदियाँ और ढलानों की

वो सौंधी खुशबू माटी की, वो गीत कहानी दादी की,

वो पतझड़, वो सावन, वसंत, वो हरियाली उन वादी की।

वो कागज की छोटी कश्ती, वो बचपन की सारी मस्ती,

उन अपनेपन की बातों से, जिससे मेरी दुनिया हँसती।

लौटा दे मुझको पेड़ों की उन घनी दुपहरी छाया को,

बाबा की तीखी डाँट और माँ की ममता की साया को।

वो प्यारे बाल-सखा देदे, वो बछड़े और गाय देदे,

मैं आज चराने जाऊँगा वो मधुवन मुझे हाय देदे।

उन खलियानों की घासों पर अब भी मैं जाके लेटूँगा,

पेड़ों को जाके पकड़-पकड़ बारी-बारी से भेंटूँगा।

सावन की उस रिमझिम फुहार में झूले फिर से झूलुँगा,

वो कजरी मुझको याद नहीं बचपन ही सारा गा लूँगा।

होली के पावन रंगों से मैं पुनः नहाने आऊँगा,

उस सौंधी खुशबू माटी की कुछ इसी बहाने पाऊँगा।

ला आज मुझे फिर से देदे बचपन के मेरे वो बस्ते,

वो कागज, कलम, दवात और कपड़े, जूते थे जो सस्ते।

वो रोटी-दही आज देदे माँ आज बहुत मैं भूखा हूँ,

हूँ बालक वही आज भी मैं अब भी मैं रूखा-सूखा हूँ।

है जलन बहुत अब भी मुझमें वो शीतल मन्द छाँव देदे,

मैं खेल सकूं फिर से जिसमें ऐसा स्वच्छन्द गाँव देदे।

देना पैसे तुम मुझे आज फिर से मेले मैं जाऊँगा,

दादी की खातिर मूँगफली कुछ केले लेकर आऊँगा।

मैं आज ढूँढ़ता फिरता हूँ उस अपनेपन को अपनों में,

जो था शायद बस बचपन में या अब बसता है सपनों में।

लगता है शैशव खत्म हो गया पैदा होते ही रातों में,

या किश्मत छीन उठी तुझसे था लाया नन्हें हाथों में।

क्यों छोड़ दिया सबने लिखना चिठ्ठी-पाती का वो वादा,

अब तो आधुनिकता है आयी अपनों की बातों में ज्यादा।

कल तक थी फूट रही खुशियाँ उस अपनेपन की बातों से,

है अन्धकार भी आज डरा उस सन्नाटों की रातों से।

क्यों रूठ गये ओ घर वाले क्यों छूट गये कोई कह दे,

लौटा दे फिर से वो खुशियाँ क्या है कीमत तू हाँ कह दे।

 

5 Comments

  1. mani mani 16/09/2016
  2. C.M. Sharma babucm 16/09/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 16/09/2016
  4. Kajalsoni 16/09/2016

Leave a Reply