एक अनूठी प्रेम कहानी

sheetarth

देख रही हैं जमीं आसमां को, जैसे कुछ ढूंढ रही हो,
कब आयेगा मेरा बादल, मन ही मन ये पूछ रही हो,
चुप्पी साधे खड़ा आसमां, नीचे सिर झुकाता है,
रोता है अन्दर ही अन्दर, आंसू गिरा ना पाता है,
हर रोज सूरज तपिश से अपनी, जमीं को यूँ जलाता है,
कह रहा हो जैसे उससे, तेरा बादल क्यूँ तुझे नहीं बचाता है,
रातों के अंधियारों में, छिपकर चाँद निकलता है,
झुलस चुकी जमीं के घांव पर, मरहम रोज लगाता है ,
जल्दी आयेगा तेरा बादल, हर रात तसल्ली देता है …

.
.
शीतलेश थुल 

12 Comments

  1. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma (bindu) 16/09/2016
    • शीतलेश थुल शीतलेश थुल 19/09/2016
  2. mani mani 16/09/2016
  3. शीतलेश थुल शीतलेश थुल 16/09/2016
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 16/09/2016
  5. शीतलेश थुल शीतलेश थुल 16/09/2016
  6. C.M. Sharma babucm 16/09/2016
    • शीतलेश थुल शीतलेश थुल 19/09/2016
  7. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 16/09/2016
    • शीतलेश थुल शीतलेश थुल 19/09/2016
    • शीतलेश थुल शीतलेश थुल 19/09/2016

Leave a Reply