ईश्वर से विश्वाश न छूटे

मरकर भी ये सांस न छूटे

न मिलकर भी ये आस न छूटे

छूटना है तो छुट जाए ये ज़िन्दगी

पर ईश्वर से विश्वाश न छूटे

 

ज़िन्दगी की रेलगाड़ी में पहिये हो अगर टूटे फूटे

सिसक सिसक कर चलती गाडी की ये कहानी है अनूठी

मर गयी है इसकी आत्मा

और है दुःख के लावे फूटे

पर ईश्वर से विश्वाश न छूटे

 

दुःख की नगरी में कदम रखती है

और अंगारों पर चलती है

ज़िन्दगी की रग रग में

दुःख की ही नदियाँ बहती है

रो रो कर आसमान भी फूटे

पर ईश्वर से विश्वाश न छूटे

 

ईश्वर की ही देंन  है यह सब

सोच सोच कर सहते हम सब

पर उसका न कोई विरोधी

चाहे हो वह कितना भी क्रोधित

दुःख के इस महासागर में

गोते लगाती सारी  दुनिया

कोई न उसका विरोध करे

चाहे हो कितनी भी कमियां

न थकते वो ये सारे ज़ुल्म ढाते ढाते

पर ईश्वर से विश्वाश न छूटे ……

16 Comments

  1. डॉ. विवेक Dr. Vivek Kumar 16/09/2016
    • shrija kumari shrija kumari 19/09/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 16/09/2016
    • shrija kumari shrija kumari 16/09/2016
  3. शीतलेश थुल शीतलेश थुल 16/09/2016
    • shrija kumari shrija kumari 16/09/2016
  4. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma (bindu) 16/09/2016
    • shrija kumari shrija kumari 19/09/2016
  5. mani mani 16/09/2016
    • shrija kumari shrija kumari 16/09/2016
  6. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 16/09/2016
    • shrija kumari shrija kumari 16/09/2016
  7. C.M. Sharma babucm 16/09/2016
    • shrija kumari shrija kumari 16/09/2016
    • shrija kumari shrija kumari 16/09/2016

Leave a Reply