मृत्युंजय

सहो, अमर कवि ! सहो, अत्याचार सहो जीवन के,
सहो, धरा के कंटक, निष्ठुर वज्र गगन के ।
कुपित देवता हैं तुम पर हे कवि ! गा-गा कर
क्योंकि अमर करते तुम दुख-सुख मर्त्य भुवन के,
कुपित दास हैं तुम पर, क्योंकि न तुमने अपना
शीश झुकाया, तुम ने राग मुक्ति का गाया,
छंदों और प्रथाओं के निर्मल बंधन में
यकसी भाँति भी बँध न सकी ऊँचे शैलों से
गरज-गरज आती हुई तुम्हारे निर्मल
और स्वच्छ गीतों की वज्र हास-सी काया ।
निर्धनता को सहो, तुम्हारी यह निर्धनता
एक मात्र निधि होगी कभी देश जीवन की ।
अश्रु बहाओ, दिपी तुम्हारे अश्रु कणों में,
एक अमर वह शक्ति न जिस को मंद करेगी
मलिन पतन से भरी रात सुनसान, मरण की ।
अँजलियाँ भर-भर सहर्ष पीओ जीवन का
तीक्ष्ण हलाहल, और न भली सुधा सात्विकी,
पीने में विष-सी लगती हैं, किन्तु पान कर
मृत्युंजय कर देती है मानव जीवन को ।

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