देखो रेलगाड़ी………मनिंदर सिंह “मनी”

कविता

छुक छुक देखो करे रेलगाड़ी |
जाये शह्र, गांव, राह पहाड़ी ||

भोंपू ज़ोर ज़ोर बजा भागती |
कितनी तेजी से भागी आती ||

अपनी मंजिल पर जा कर रुके |
विशाल रूप देख कर सभी डरे ||

बच्चे देख सभी हाथ हिलाते |
आयी गाड़ी सबको बतलाते ||

भेद भाव किये बिना ले जाती |
मुसाफ़िरों के दिल को है भाती ||

जान पहचान सबसे करवाये |
याराना एक दूजे संग बढ़ाये ||

बाहरी सतह कठोर कितनी |
नर्म लगे है अंदर से उतनी ||

जीने का मतलब है सिखलाती |
फ़र्ज़ निभाना ऐसे बतलाती ||

छुक छुक देखो करे रेलगाड़ी |
जाये शह्र, गांव, राह पहाड़ी ||

मनिंदर सिंह “मनी”

18 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 16/09/2016
    • mani mani 16/09/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 16/09/2016
    • mani mani 16/09/2016
  3. Meena Bhardwaj Meena bhardwaj 16/09/2016
    • mani mani 16/09/2016
  4. Rajeev Gupta RAJEEV GUPTA 16/09/2016
    • mani mani 16/09/2016
  5. डॉ. विवेक Dr. Vivek Kumar 16/09/2016
    • mani mani 16/09/2016
  6. Rajeev Gupta Rajeev Gupta 16/09/2016
    • mani mani 16/09/2016
  7. शीतलेश थुल शीतलेश थुल 16/09/2016
    • mani mani 16/09/2016
  8. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 16/09/2016
  9. Kajalsoni 17/09/2016
  10. mani mani 17/09/2016

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