बहन कुँवरी की स्मृति

बहिन ! स्वर्ग में हो, तुम क्या मेरी बातों को
सुन पाती हो ? उठ वसंत के इन प्रांतों में
मैं करता हूँ आँसू भर-भर कर याद तुम्हारी !
बुला लिए हैं अपने पास उमा और पारी
दोनों मैंने, पर इन दोनों में कोई भी न
वैसी मेरी बहिन ! बचपन में जैसी तुम थी !

मुझे याद आती है उन बीते वर्षों की,
बचपन की, बचपन के चंचल हर्षों की,
सुबों की डालों पर चढ़कर उन्हें झुकाना,
और ललाई भरे सेब पुलकित हो खाना
कभी खुबानी की डालों को हिला-हिलाकर
छाया को पीली खुबानियों से देना भर !

शीत पूष में, नभ में थे बादल घिर आते,
चलती तीक्ष्ण हवा थी, व्यर्थ पवन बहाते
बर्फ़ीले तूफ़ान, हिमालय के उर से थे !
जम जाती थी बर्फ़ टोपियों पर, पाँवों के
तलुवे के निशाँ पर, हिम की कुटी बनाते
फिरते रहते थे बाहर ही गाते-गाते !

और दूसरे दिन जब धूप निकल आती थी ।
तब वह पीली धूप हमें कितनी भाती थी ।

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