पाँवलिया

मेरे गृह से सुन पडती गिरि-वन से आती
हँसी स्वच्छ नदियों की, सुन पडती विपिनों की,
मर्मर ध्वनियाँ, सदा दीख पड़ते घरों से
खुली खिड़कियों से हिमगिरि के शिखर मनोहर,
उड़-उड़ आती क्षण- क्षण शीत तुषार हवाएँ,
मेरे आँगन छू बादल हँसते गर्जन कर,
झरती वर्षा, आ बसंत कोमल फूलों से,
मेरे घर को घेर गूँज उठता, विहगों के दल
निशी दिन मेरे विपिनो में उड़ते रहते ।

कोलाहल से दूर शांत नीरव शैलों पर,
मेरा गृह है, जहाँ बच्चियों-सी हँस-हँस कर,
नाच-नाच बहती हैं छोटी-छोटी नदियाँ,
जिन्हें देखकर, जिनकी मीठी ध्वनियाँ सुनकर,
मुझे ज्ञात होता जैसे यह प्रिय पृथ्वी तो,
अभी-अभी ही आई है, इसमें चिंता को
और मरण को, स्थान अभी कैसे हो सकता है ?

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