नज़र को चीरता जाता है मंज़र

नज़र को चीरता जाता है मंज़र
बला का खेल खेले है समन्दर

मुझे अब मार डालेगा यक़ीनन
लगा है हाथ फिर क़ातिल के खंजर

है मक़सद एक सबका उसको पाना
मिल मस्जिद में या मंदिर में जाकर

पलक झपकें तो जीवन बीत जाये
ये मेला चार दिन रहता है अक्सर

नवाज़िश है तिरी मुझ पर तभी तो
मिरे मालिक खड़ा हूँ आज तनकर

4 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 14/09/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 14/09/2016
  3. डॉ. विवेक Dr. Vivek Kumar 14/09/2016

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