आता नहीं मुझे यूँ बेमौत मर जाना

आता नहीं मुझे यूँ बेमौत मर जाना
सीखा नहीं हौसलों ने भी बिखर जाना।

काँटों को भाता है चुभकर टूट जाना
फूलों की शान है महककर बिखर जाना।

हमें अब भी आता है बच्चों की तरह
उछलते कूदते मुस्कराते घर जाना।

पंख फैलाये उड़ान लेने के पहले
चिड़िया जान लेती है कि है किधर जाना।

मैं भी इक आदमी हूँ ठीक खुदा की तरह
हर पल कुछ करते हुए और निखर जाना।

सीने से निकल लब तक आती ये पुकार
ये भी मेरी इबादत का है सँवर जाना।

——- भूपेन्द्र कुमार दवे
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3 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 14/09/2016
  2. babucm babucm 14/09/2016
  3. Kajalsoni 14/09/2016

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