हक़ीक़त हमारी

हम हैं क्या ,

और  है क्या हक़ीक़त हमारी

जुड़ती हैं जब लकीरें

आकार  बन जाते हैं

सूर्य की किरणों में जैसे

रंग ढल  जाते हैं

रंगों और आकारों  की  दुनिया  में

नक़्श इंसानों के पल पल बदल जाते हैं

चलता रहता है यह खेल

चेहरे  हर बार बदल जाते है

खिलते हैं जब गुल

तो बहार बन जाते हैं

बदलते ही मौसम

बस खार  रह जाते हैं

आकारों से ही है पहचान हमारी

मिटने पर ना जाने वो कहाँ जाते हैं

है इक  बुल्लबुला  रंगों का

जिससे हम ग़ुब्बार बन जाते हैं

फूटते ही सब ,हवा की मानिंद

आकाश  में बिखर जाते  हैं

जिस हस्ती की ख़ातिर

ना जाने क्या क्या जोखिम उठाते हैं

हक़ीक़त में बस

फिर हम ज़र्रे में  सीमिट  जाते हैं

 

 

 

 

 

 

 

 

11 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 14/09/2016
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 14/09/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 14/09/2016
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 14/09/2016
  3. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 14/09/2016
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 14/09/2016
  5. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 14/09/2016
  6. Kajalsoni 14/09/2016
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 14/09/2016
  7. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 14/09/2016

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