“…वो क्या जाने!”

पा ही लेंगे अपनी मंजील
चल के जरा-जरा,
संघर्ष करने से जो लडखडाये
‘कामयाबि’ वो क्या जाने….

हासील कर लेंगे हर खुशिया
गम भुलाके जरा-जरा,
रोने से जिसको फुरसत ना मिले
‘हसना’ वो क्या जाने……

कर लेंगे पुरे ख्वाब सच
मेहनत कर जरा-जरा
मेहनत से जो कतराये
‘सच्चे ख्वाब’ वो क्या जाने…….

भर देती नन्ही बुंद भी
सागर को जरा-जरा,
सुविधाओ के मंच पर बसा
‘संघर्ष’ वो क्या जाने……

मुस्काहट के पिछे छिप जाता दर्द
सबको दिखता हरा-भरा,
ना महसुस किया दर्द किसीका
‘गम’ वो क्या जाने…..

हर वो, जो दिखे चमकीला-सुनहरा
नही होता सोना खरा,
दिखावट पे जो इतराए
‘सच्चाई’ वो क्या जाऩे…..

हर दिन मरता किसी भय से
औ’ जिता डरा-डरा,
‘भयंकर’ है दुनिया उसके लिए
‘मस्ती’ वो क्या जाने…….

हंसराज केरेकार ‘राजहंस’

6 Comments

  1. डॉ. विवेक Dr. Vivek Kumar 13/09/2016
  2. C.M. Sharma babucm 13/09/2016
  3. Kajalsoni 13/09/2016
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 13/09/2016

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