‘छप्पय छन्द’ और ‘कुण्डलिया छन्द’ सृजन हेतु

‘छप्पय छन्द‘ हिंदी छन्द परिवार का पुराना छन्द है। ‘कुण्डलिया‘ की तरह यह भी छ: पंक्तियों का छन्द है। फ़र्क़ मात्र यही है कि ‘कुण्डलिया‘ छन्द की शुरूआत ‘दोहे‘ से होती है और तत्पश्चात चार पंक्तियां रोला की होतीं हैं। अंत में वही शब्द या शब्द समूह आना अनिवार्य है जिस चरण से ‘कुण्डलिया‘ शुरू होता है। उदाहरणार्थ निम्न कुण्डलिया देखें :—

जिसमें सुर–लय–ताल है / कुण्डलिया वह छंद // (पहली पँक्ति के दोनों चरणों में 13 + 11 = 24 मात्राएँ)
सबसे सहज–सरल यही / छह चरणों का बंद // (दूसरी पँक्ति के दोनों चरणों में 13 + 11 = 24 मात्राएँ)
छह चरणों का बंद / शुरू दोहे से होता // (तीसरी पँक्ति के दोनों चरणों में 11 + 13 = 24 मात्राएँ)
रोला का फिर रूप / चार चरणों को धोता // (चौथी पँक्ति के दोनों चरणों में 11 + 13 = 24 मात्राएँ)
महावीर कविराय / गयेता अति है इसमें // (पाँचवी पँक्ति के दोनों चरणों में 11 + 13 = 24 मात्राएँ)
हो अंतिम वह शब्द / शुरू करते हैं जिसमें // (छट्टी पँक्ति के दोनों चरणों में 11 + 13 = 24 मात्राएँ)

(1.)
सूखा–बाढ़, अकाल है, कुदरत का आक्रोश
किया प्रदूषण अत्यधिक, मानव का है दोष
मानव का है दोष, धरा पे संकट छाया
शाप बना विज्ञान, विकास कहाँ हो पाया
महावीर कविराय, लाचार प्यासा–भूखा
झेल रहे हम मार, कभी बाढ़, कभी सूखा

(2.)
दुःख में आँसू संग हैं, तो सुख में मुस्कान
ढ़लकर सुख–दुःख में बने, मानव की पहचान
मानव की पहचान, सम्पदा बड़ी अनूठी
अनुभव की यह खान, नगों पर जड़ी अंगूठी
महावीर कविराय, फले–फूले नर सुख में
कभी न छोड़े साथ, संग है आँसू दुःख में

(3.)
तोड़ी कच्ची आमियाँ, चटनी लई बनाय
चटकारे ले तोहरा, प्रेमी–प्रीतम खाय
प्रेमी–प्रीतम खाय, सखी सुन–सुन मुस्काती
और कहूँ क्या तोय, लाज से मैं मर जाती
महावीर कविराय, राम बनाय हर जोड़ी
क्यों इतनी स्वादिष्ट, आमियाँ तूने तोड़ी

(4.)
दीवाने–ग़ालिब पढ़ो, महावीर यूँ आप
उर्दू, अरबी, फ़ारसी, हिंदी करे मिलाप
हिंदी करे मिलाप, सभी का मिलन सुहाना
मिर्ज़ा के हों शेर, बने यह जग दीवाना
हैं कवि के यह बोल, चिराग़ तले परवाने
आँखें बनी जुबान, पढ़े सब कुछ दीवाने

(5.)
ममता ने संसार को, दिया प्रेम का रूप।
माँ के आँचल में खिली, सदा नेह की धूप।
सदा नेह की धूप, प्यार का ढंग निराला।
भूखी रहती और, बाँटती सदा निवाला।
महावीर कविराय, दिया जब दुःख दुनिया ने।
सिर पर हाथ सदैव, रखा माँ की ममता ने।

जबकि ‘छप्पय छन्द‘ में प्रथम चार पंक्तियों में रोला के चार चरण हैं। तत्पश्चात नीचे की दो पंक्तियाँ उल्लाला की होती हैं। जो कि क्रमश: 26 / 26 मात्राओं में होती हैं। यानि छप्पय छन्द में उल्लाला के अंतर्गत दोहा के विषम चरण की चार पंक्तियां होती हैं। जिनमे ग्यारहवीं मात्रा का लघु होना आवश्यक हैं। उदाहरणार्थ देखें :—

निर्धनता अभिशाप, बनी कडवी सच्चाई (पहली पँक्ति के दोनों चरणों में 11 + 13 = 24 मात्राएँ)
वक्त बड़ा है सख्त, बढे पल–पल महंगाई (दूसरी पँक्ति के दोनों चरणों में 11 + 13 = 24 मात्राएँ)
पिसते रोज़ ग़रीब, हाय! क्यों मौत न आई (तीसरी पँक्ति के दोनों चरणों में 11 + 13 = 24 मात्राएँ)
“महावीर” कविराय, विकल्प न सूझे भाई (चौथी पँक्ति के दोनों चरणों में 11 + 13 = 24 मात्राएँ)
लोकतंत्र की नीतियाँ, प्रहरी पूंजीवाद की (पाँचवी पँक्ति के दोनों चरणों में 13 + 13 = 26 मात्राएँ)
भ्रष्टतंत्र की बोलियाँ, दोषी कडवे स्वाद की (छट्टी पँक्ति के दोनों चरणों में 13 + 13 = 26 मात्राएँ)

इस तरह “छप्पय छन्द” तैयार हो गया। नीचे पाँच “छप्पय छन्द” दिए गए हैं। रोला छन्द में लिखने वालों को कोई दिक्कत पेश नहीं आएगी। थोड़े अभ्यास के बाद सभी कवि लिख सकते हैं।

(1.)
भ्रष्टतंत्र को बदल, मचल मत भ्रष्टाचारी
जनहित में कर काम, कहे जनता यह सारी
कुचल रहे अरमान, कुशासन है बीमारी
कैसा बना विधान, दुखी जनता बेचारी
अच्छी छवि के लोग ही, अब सत्ता में लाइए
लोकतंत्र में आस्था, फिर से आप जगाइए

(2.)
प्रेम प्यार की बात, लगे सबको ही मीठी
प्यार बिना है मित्र, ख़ुशी भी फीकी–फीकी
कानों में दिन–रात, प्रेम की गूंजे सीटी
मन में आठों याम, तुम्हारी मूरत दीखी
कृष्ण बना तो रास रच, बंसी मधुर बजाइए
मीठी वाणी बोलकर, हरदम ही इतराइए

(3.)
सबका बेडागर्क, वर्गभेद ही कर रहा
अमीर करते ऐश, ग़रीब तिल–तिल मर रहा
“महावीर” कविराय, आम आदमी डर रहा
शासक खुद इल्ज़ाम, निज़ाम पे धर रहा
कहते तुलसीदास भी, समरथ को क्या दोष है
जनता तो इक गाय है, ग्वाला तो निर्दोष है

(4.)
“महावीर” यह राष्ट्र, एक स्वर में गाएगा
शिक्षा पर यदि केंद्र, कठोर नीति लाएगा
अमीर–ग़रीब भेद, फिर कहाँ रह पायेगा
यदि शिक्षा का ग्राफ़, एक सा हो जायेगा
भारत को यह विश्व भी, बड़े गर्व से देखता
शिक्षा एक समान यदि, और बढ़ेगी एकता

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  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 13/09/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 13/09/2016

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