कविनामी दोहे—दोहाकर : महावीर उत्तरांचली

सब कहें उत्तरांचली, ‘महावीर’ है नाम
करूँ साहित्य साधना, है मेरा यह काम //१. //
‘महावीर’ बुझती नहीं, अंतरघट तक प्यास
मृगतृष्णा मिटती नहीं, मनवा बड़ा हतास //२. //
करवट बदली दिन गया करवट बदले रात
‘महावीर’ पल-पल गिने, काल लगाये घात //३. //
रंगों का त्यौहार है, उड़ने लगा अबीर
प्रेम रंग गहरा चढे, उतरे न ‘महावीर’ //४. //
‘महावीर’ अब देखिये, फूल चढ़े सिरमौर
सजनी इतराती फिरे, रूप और का और //५. //
मुक्तछंद के दौर में, कौन सुनाये बंद
‘महावीर’ कविराज की, अक्ल पड गई मंद //६. //
काँटों का इक ताज है, जीवन का यह रूप
‘महावीर’ यह सत्य है, छाया का वर धूप //७. //
सदियों तक संसार में, जिंदा रहे विचार
‘महावीर’ करते रहों, तेज कलम की धार //८. //
‘महावीर’ मनवा उड़े, लगे प्यार को पंख
बिगुल बजाय जीत का, फूंक दिया है शंख //९. //
‘महावीर’ अपने बने, जो थे कल तक ग़ैर
मालिक से मांगूं यही, सबकी होवे ख़ैर //१०. //
‘महावीर’ संसार ने, लूटा मन का चैन
दो रोटी की चाह में, बेगाने दिन-रैन //११. //
‘महावीर’ ये नौकरी, है कोल्हू का बैल
इसमें सारे सुख-पिसे, हम सरसों की थैल //१२. //
जीवन हो बस देश हित, सबका हो कल्याण
‘महावीर’ चारों तरफ, चलें प्यार के वाण //१३. //
जो भी देखे प्यार से, दिल उस पर कुर्बान
‘महावीर’ ये प्रेम ही, सब खुशियों की खान //१४. //
प्रतिबिम्ब देखता नहीं, चढ़ी दर्प पे धूल
‘महावीर’ क्या जानिए, ख़ार उगे या फूल //१५. //
दोहों में है ताजगी, खिला शब्द का रूप
‘महावीर’ क्यों मंद हो, कालजयी यह धूप //१६. //
दर-दर भटकी आत्मा, पाया नहीं सकून
‘महावीर’ पानी किया, इच्छाओं ने खून //१७. //
गोरी की मुस्कान पर, मिटे एक-से-एक
‘महावीर’ इस रूप पर, उपजे भेद अनेक //१८. //
जीवन बूटी कौन-सी, सूझा नहीं उपाय
‘महावीर’ हनुमान ने, परवत लिया उठाय //१९. //
‘महावीर’ संसार में, होगा कौन महान
हर चीज़ यहाँ क्षणिक है, क्यों तू करे गुमान //२०. //
भूल गया परमात्मा, रमा भोग में जीव
‘महावीर’ क्यों हरि मिले, पड़ी पाप की नीव //२१. //
हरदम गिरगिट की तरह, दुनिया बदले रंग
‘महावीर’ तू भी बदल, अब जीने का ढंग //२२. //
‘महावीर’ मनवा उड़े, चले हवा के संग
मन की गति को देखकर, रवि किरणें भी दंग //२३. //
‘महावीर’ इस रूप का, मत कीजै अभिमान
यह तो ढ़लती धूप है, कब समझे नादान //२४. //
‘महावीर’ इस दौर में, पढ़ते नहीं किताब
फिल्मस-इंटरनेट का, रखते सभी हिसाब //२५. //
आग लगी चारों तरफ़, फूल खिले उस पार
‘महावीर’ अब क्या करें, घिरे बीच मंझधार //२६. //
‘महावीर’ जब दर्द है, जीवन का ही अंग
तो इससे काहे डरो, रखो सदा ही संग //२७. //
वर्धमान ‘महावीर’ की, बात धरी संदूक
मानवता को भूलकर, उठा रहे बंदूक //२८. //
‘महावीर’ ये ज़िन्दगी, है गुलाब का फूल
दो पल ही खिलना यहाँ, फिर सब माटी धूल //२९. //
बड़े-बड़े यौद्धा यहाँ, वार गए जब चूक
‘महावीर’ कैसे चले, जंग लगी बंदूक //३०. //

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