पर्यावरण के दोहे—कवि: महावीर उत्तरांचली

छह ऋतु, बारह मास हैं, ग्रीष्म-शरद-बरसात
स्वच्छ रहे पर्यावरण, सुबह-शाम, दिन-रात // १ //
कूके कोकिल बाग में, नाचे सम्मुख मोर
मनोहरी पर्यावरण, आज बना चितचोर // २ //
खूब संपदा कुदरती, आँखों से तू तोल
कह रही श्रृष्टि चीखकर, वसुंधरा अनमोल // ३ //
मन प्रसन्नचित हो गया, देख हरा उद्यान
फूल खिले हैं चार सू, बढ़ा रहे हैं शान //४ //
मानव मत खिलवाड़ कर, कुदरत है अनमोल
चुका न पायेगा कभी, कुदरत का तू मोल // ५ //
आने वाली नस्ल भी, सुने प्रीत के गीत
कुदरत के कण-कण रचा, हरयाली संगीत // ६ //
फल-फूल कंदमूल हैं, पृथ्वी को वरदान
इन सबको पाकर बना, मानव और महान // ७ //
कर दे मानव ज़िन्दगी, कुदरत के ही नाम
वृक्ष -लताओं पर लिखा, प्यार भरा पैग़ाम // ८ //
हरयाली के गीत मैं, गाता आठों याम
कोटि-कोटि पर्यावरण, तुमको करूँ प्रणाम // ९ //

5 Comments

    • Mahavir Uttranchali Mahavir Uttranchali 13/09/2016
  1. Kajalsoni 13/09/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 13/09/2016
    • Mahavir Uttranchali Mahavir Uttranchali 13/09/2016

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