उस दिन के बादल

लेटे थे गिरि ऊपर हम कोमल दूब पर
फिरते थे इधर उधर शैलों पर नीर भर
करते कुछ परामर्श आपस में सूर्य को
देख-देख शिखरों पर आ-आ एकत्र हो
होती थी नील-नील शैलों की श्रेणियाँ
जिनको थी डरा रहीं पट-पट कर बिजलियाँ
सहसा तूफ़ान वना वन वन चिल्लाए
अम्बर में शब्द हुए भूधर थर्राए
दौड़े घनघोर मेघ हाथों में वज्र ले
आहत हो सूर्य कहाँ जाने जा छिपे ।

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