‘कश्मीर’_अरुण कुमार तिवारी

(कश्मीर पर……..)

सम भाव विटप का कर पर्यूषण चला किधर!
क्यों अन्तस् तेरा नहीं देखता भरत शिखर!

क्यों नहीं हर्ज़, कि भूले फ़र्ज़,
बढ़े काफ़िर मतवाले|
उठे व्यवधान ,नहीं सन्धान,
ले पत्थर काले-काले|
बनाते रेख ,धूम्र मत देख,
देख तू अनल इधर!

सम भाव विटप का,कर पर्यूषण, चला किधर!
क्यों अन्तस् तेरा ,नहीं देखता,भरत शिखर!

अरे ये काल, काल की चाल,
चले जस हय ढाई घर|
समय की मार,ये कठिन प्रहार,
कलुष बेला छाई गर|
छोड़ तू क्लेश, संवारे देश, बढ़ा कारवाँ जिधर|

सम भाव विटप का,कर पर्यूषण, चला किधर!
क्यों अन्तस् तेरा, नहीं देखता, भरत शिखर!

विश्व का स्वर्ग, बनाकर नर्क,
फिर रहा घाटी-घाटी|
किये शत पाप, नहीं सन्ताप,
लहू से सींचित माटी|
छोड़ निज कर्म, ले कुंदित मर्म,
राष्ट्र का धर्म बिसर|

सम भाव विटप का, कर पर्यूषण, चला किधर!
क्यों अन्तस् तेरा, नहीं निहारे, भरत शिखर!

क्यों अन्तस् तेरा …..

-‘अरुण’
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3 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 11/09/2016
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 12/09/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 12/09/2016

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