वो शख्स जिसे मनाने में जमाने लगे,

उस शख्स को हम तब पहचानने लगे जब नजरें हमसे वो चुराने लगे।
आँखें नम तो होने ही लगी न जाने क्यूँ खुद से हम ही जी चुराने लगे।
एहसास यूँ होने लगा जैसे भीड़ में बेगाने हुए,चलते चलते खुद ही ठोकर हम खाने लगे।
वो शख्स जिसे मनाने में जमाने लगे ,आज न जाने क्यूँ अजनबी से पेश आने लगे।।

लाख कोशिशों के बाद भी हजारों अफ़साने हुए
मिली हो शायद कोई हसीं मंजिल उन्हें, जिसके पीछे वो दीवाने हुए।
या फिर कमी रही हो चाहत में कोई हमारी जो हम पराये हुए।

अब तो ख्वाबों से भी डर लगने लगा ,ख्वाबों में भी वो रूठ कर जाने लगे।
खुद के नसीब पर अब आंसू हम बहाने लगे,
न शक हो तन्हाई का किसे भी तो यूँ बेवजह ही हम मुस्कुराने लगे
और उन्हें लगा कि उनसे बिछड़कर खुश हैं हम
हमे देखकर वो मुस्कुराने लगे॥