बस का सफर

एकबार एक नेताजी को
करना पड़ा बस में सफर
सोचा , कितना अच्छा होता
खली होता बस ये अगर

अगर मगर की इस चक्कर में
मंजिल उनकी आ गयी
उतरे वे बस से ये कहकर
जनता का कर कुछ और श्रोषण
खरीद लेंगे एक बस ही नयी

न होगी ये अगर मगर की चक्कर
न होगी ये आगरा तफरी
थोड़ी और बदनामी मैं सह लूंगा
कानो में अपने रूई डालकर

9 Comments

    • sudarshan41 07/06/2017
  1. Bindeshwar prasad sharma bindeshwar prasad sharma 02/06/2017
    • sudarshan41 07/06/2017
  2. SARVESH KUMAR MARUT SARVESH KUMAR MARUT 03/06/2017
    • sudarshan41 07/06/2017
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 03/06/2017
    • sudarshan41 07/06/2017
  4. MANOJ KUMAR MANOJ KUMAR 03/06/2017

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