पीताभ होता मार्तण्ड

अपनी बातों से
कुरेदता हूँ
खुद का अन्तर्मन
ताकि उठे नही
फूट पड़े
भँड़सार की जलती रेत मे
उछलते मकई के दाने समान
मुझे स्वंय को शुभ्र तप्त
होते देखना है
जैसे कि पीताभ
मार्तण्ड होता है….

कपिल जैन

3 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 11/09/2016
  2. babucm babucm 12/09/2016
  3. कपिल जैन कपिल जैन 12/09/2016

Leave a Reply