अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर

नारे जब गाए जाते हो भारत की बर्बादी के,
ये कैसी स्वतंत्रता है अभिव्यक्ति के आजादी के
कोई सत्ता को ललकार रहा है राष्ट्रद्रोह के नारों से
और समर्थन पा जाता है राजनीतिेक गलियारों सें
कोई देशदा्रेह को भी वक्तव्यों की आजादी कह देता है
लोकतंत्र की मर्यादा को तहस नहस कर देता है
जिनकी भाषा उन्मादी है और मंसूबे जहरीले है
प्रशासन भी नतमस्तक है और कानूूनी पंजे ढ़ीले है
जो केवल बातें करते हो शोणित की भाषा में,
यह घटना तो आती है देशद्रोह की परिभाषा में
घाटी मे हरदम आतंको का घात दिखाई देता है
बारुदी लपटे दिन रात दिखाई देता है
वहाँ मधुरता नहीं गूँजती हैै, कोयल की कूकों से,
धूम धड़ाका होता है केंवल गोली बंदूको सें
जब घाटी में लाखो पंडित के घर छिन जातें है
खुद को सेकुलर कहने वाले केवल तमाशबीन बन जाते हैं
हरदम वो रहते है दिल दहलाने की तैयारी में
जश्न मनाया जाता है गैरों के घर इफतारी में
वो घाटी को कब्रिस्तान बनाने की कसमें खाते है
फिर भी हम उनके खातिरदारी की रस्म निभाते हैं
इस पर हाथ बाँधकर बैठंे रहने की क्या मजबूरी है
इस प्रश्न का हल ढूँढना अब तो बहुत जरुरी है
हिंसा किसी समस्या का हल कभी नहीे हो सकता है
इस राह पर चलकर कोई कभी सफल नहीं हो सकता है

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