माँ (बाल कविता)

*’माँ’ बाल कविता (ताटंक छंद)*

हे! माँ तेरी सूरत जग में, मुझको लगती प्यारी है।
तेरे बिन घर-मन्दिर सूना, सूनी दुनिया सारी है।

हट्टा-कट्टा हूँ फिर भी माँ दुबला मुझे बताती है।
काजू किसमिस गरी छुहारा, मुझको रोज खिलाती है।

खेल-कूद में खाना भूलूँ, तब माँ डांट लगाती है
दूध भात की थाली लेकर, पीछे-पीछे आती है।।

सजा धजा कर माँ नित मुझको, राजकुमार बनाती है
बुरी बला से बचा रहू मै, काजल खूब लगाती है।।

लोरी गाती गीत सुनाती परीलोक दिखलाती है।
मीठी थपकी दे-देकर माँ, मुझको रोज सुलाती है।।

लगती चोट मुझे तो माता, करुणा से भर जाती है।
मुझको होता दर्द कभी तो, आँसू खूब बहाती है।।।

मेरी खुशियों की खातिर माँ, लाखो कष्ट उठाती है।
सुने एक किलकारी मेरी, वह हँसती मुस्काती है।।

माँ राहों में फूल बिछाती, खुद काटों पर सोती है।।
कभी मार चांटा मुझको वह, अक्सर घंटों रोती है।।
!!!!
!!!!
सुरेन्द्र नाथ सिंह ‘कुशक्षत्रप’

13 Comments

  1. babucm babucm 08/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 08/09/2016
  2. babucm babucm 08/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 08/09/2016
      • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 08/09/2016
  3. शीतलेश थुल शीतलेश थुल 08/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 08/09/2016
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 08/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 08/09/2016
  5. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 08/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 08/09/2016
  6. Kajalsoni 13/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 13/09/2016

Leave a Reply