नट का खेल

हमारे ज़माने में नट का खेल ,
बहुत आम हुआ करता था ,
हर महीने पंद्रह दिनों में ,
कहीं ना कहीँ दिख ही जाया करता था।

एक रस्सी पर चलता हुआ ,
छोटा सा मरियल सा बच्चा ,
और उसके हाथों में होता ,
बड़ा सा डंडा ,जिसे पकड़ कर ,
वह बड़ी होशियारी से ,
बैलेंस साधा करता था।,

खेल खत्म होने के बाद भी ,
हम बच्चे उसी बच्चे की ,
बातें करते रहते थे ,
जैसे कि वह बच्चा ,
कोई साधारण बच्चा ,
न होकर कोई हीरो हो ,
जो इतना मुश्किल काम ,
इतनी आसानी से कर लेता था।

और बाद में भी वह कई दिनों तक ,
हमारे दिमाग पर छाया ही रहता ,
और हम बच्चे माँ बाप से ,
छिप कर तरहतरह से बैलेंस साधने की,
कोशिश किया करते थे ,
जैसे कि दस इंच चौड़ी दीवाल पर,
साइकिल चलाने का बैलेंस।

अब यह नजारा बड़ी ,
मुश्किल से दिखाई देता हैं,
अब तो घर में बैठे बैठे ही,
टी. वी. पर ही हम तरह तरह का करतब,
बड़ी आसानी से अक्सर ही देखा करतें हैं ,
मग़र क्या हम और हमारे बच्चे ,
कभी उन से कभी जुड़ भी पातें हैं ?

क्या शायद इसीलिए हम और हमारे ,
जमाने के लोगों ने जीवन के हर छेत्र में ,
खेल खेल में ही बैलन्स करना ,
बड़ी आसानी से सीख लिया था ,
क्या इसलिए आज हर छेत्र में ,
हर रिश्ते में संतुलन की काफी कमी है.

कभी कभी एक छोटी सी घटना ,
या एक छोटा सा बच्चा ,
हमें हमारी जिंदगी का ,
कितना बड़ा पाठ पढ़ा जाता है।

6 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 08/09/2016
    • Manjusha Manjusha 11/09/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 08/09/2016
    • Manjusha Manjusha 11/09/2016
    • Manjusha Manjusha 11/09/2016

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