**तुम होते तो शायद और बात होती::Er Anand Sagar Pandey**

**तुम होते तो शायद और बात होती**

सहर तो अब भी होती है, सूरज अब भी निकलता है फलक़ पर,
मगर मैं सोचता हूं कि तुम होते तो शायद और बात होती,
दिन तो अब भी कट जाता है रोजमर्रा की चीजें जुटाने में,
मगर मैं सोचता हूं कि तुम होते तो शायद और बात होती ll

शामें अब भी आती हैं मेरी दहलीज को छूने,
अब भी ढलता हुआ सूरज मुझसे मिलकर जाता है,
जुगनू अब भी भटकतें हैं मेरे बागीचे में,
तारे अब भी रात भर यूं ही पहरे पे होते हैं,
चांद अब भी इक रास्ता ढूढता है गुज़र जाने के लिये,
ये मंज़र बेनज़ीर है, सब कहते हैं, मैं मानता हूं,
मगर मैं सोचता हूं कि तुम होते तो शायद और बात होती l

खिड़कियों से छन-छन कर अभी भी रोशनी आती है,
मेरे कमरे में रखा आईना चमक सा उठता है,
इक मुश्क सी अब भी बिखर जाती है फिज़ाओं में,
मेरा घर अब भी सजा रहता है किसी की खातिर,
हवायें अब भी मुझे छूती हैं तो तुम महसूस होते हो,
ये सब कहते हैं कि मैं ज़िंदा हूं मगर ना जाने क्यों,
मैं सोचता हूं कि तुम होते तो शायद और बात होती l

तुम्हारे खतों की तहरीर मुझे अब भी सताती है,
वो दीवाने जज़्बात मुझ से अब भी छुप-छुप कर मिला करते हैं,
गज़लें अब भी मेरी डायरी से निकलकर मेरे कमरे में टहलती रहती हैं,
मेरा घर अब भी किसी की यादों में डूबा रहता है,
मुझे अब भी मुलाक़ात के वो लम्हें बुलाते हैं,
वो गुज़रा हुआ कल काफ़ी लगता है मेरे जीने के लिये,
मगर मैं सोचता हूं कि तुम होते तो शायद और बात होती l

ज़िन्दगी अब भी किसी मोड़ पर बैठी है शायद,
उम्र रेत की मानिन्द फिसलती जा रही है,
सांस अब भी आती है, दिल अब भी धड़कता है,
अब भी जीने का वहम बाकी है कहीं मुझमें,
और क्या चाहिये आखिर ज़िन्दगी से मुझे,
यूं ही गुज़र रही है, एक दिन गुज़र ही जायेगी,
मगर मैं सोचता हूं कि तुम होते तो शायद और बात होती ll

All rights reserved.

-Er Anand Sagar Pandey

7 Comments

  1. Manjusha Manjusha 07/09/2016
  2. C.M. Sharma C.m sharma(babbu) 07/09/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 08/09/2016
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 08/09/2016
  5. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 08/09/2016

Leave a Reply