१५ क्षणिकाएँ—क्षणिकाकार: महावीर उत्तरांचली

(१.) तार
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आत्मा
एक तार है
जोड़ रखा है जिसने
जीवन को
मृत्यु से
और मृत्यु को
जोड़ा है …
पुन: नवसृजन से ….

(२.) क्रांति
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परत-दर-परत
खुल रही हैं वे बातें
जो लाख पर्दों में
छिपीं रहती थीं …
ये वास्तव में
परिवर्तन है
या दूर संचार क्रांति
से उपजी …
कोई अन्य दुनिया
जहाँ बिना आईने के
सब कुछ
देखा जा सकता है!!

(३.) संवेदनाएँ
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जीवन का अस्थित्व
अभी बाकी है
शायद इसलिए
बम धमाकों
और जिहादी नारों
के बीच भी बची हुई हैं
कुछ मानवीय संवेदनाएँ !

(४.) प्रवाह
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वे शब्द ही अपना
सार्थक प्रभाव
छोड़ पाने में
सक्षम हैं शायद …
जो स्फुटित होते हैं
स्वयमेव
शब्द प्रवाह से …
वर्ना रचनाएँ
शब्दों की कब्रगाह
ही तो हैं ……।

(५.) अहम्
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जीवित है अहम् जब तक
शायद मानव
जीवित है तभी तक …
वरना —
जलने से पूर्व
लाश भी
एक शरीर ही तो है।

(५.) भाग्य
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खुद ही बदलता है
समर्थ व्यक्ति
अपना भाग्य
शायद इसलिए
ज्योतिष को नहीं
मानते कुछ लोग
क्योंकि —
वास्तविक रेखाएँ
कर्म से ही बदलती हैं।

(६.) रेखांकन
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स्वयं को
रेखांकित करने के
प्रयास में … बिखर गया
रचनाकार स्वयं …
अपने ही भीतर
अंतहीन विस्तार में …

(७.) सम्प्रेषण
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सम्प्रेषण यदि नहीं है
तो हमारा स्वर स्वयं
हमारी आत्मा को भी
नहीं झकझोर सकता …
परमात्मा को
पाना तो बहुत
दूर की बात है ….

(८.) तूलिका
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तूलिका से जब
अनुशासित रूप में
रंग काग़ज़ पर
उकेरे जाते हैं
तो चित्र स्वयं
बोलता है …
चित्रकार तब भी
मौन चुनता है।

(९.) नियति
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आँखों से जो दृष्टिगोचर है
यदि वह सत्य है
तो फिर
भ्रम की मनोस्थिति क्या है
क्यों मानव की नियति
कुछ और …
कुछ और जानने में है।

(१०.) संस्कार
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पाश्चात्य पाशुविकता,
दरिंदगी और भोंडेपन को
अपना कर हम न तो
आत्याधुनिक ही बन सके
और न ही हमारे भीतर
परम्परागत संस्कार ही
जीवित रह पाए …
जो हमारे भीतर / निरंतर
मानवता के कई
अध्याय रचते थे !!

(११.) आलोक
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जीवन के प्रस्थान बिन्दू से
हम अपने चरमबिन्दू पर
पंहुच हैं …
चहूँ ओर अब तक
कमाए गए
समस्त अनुभवों का
आलोक फैला है
और प्रकाश से
चकाचौंध आँखें
कुछ भी देख पाने में
असमर्थ हैं !

(१२.) विकट
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आस और निरास के
बीच की स्थिति
बड़ी ही विकट है …
व्यक्ति न तो
उधर ही जा पाता है
जहाँ उसे जाना है
और इधर का भी
नहीं रहता जहाँ वह
अपने शरीर का समस्त भार
पृथ्वी पर डाले खड़ा है …

(१३.) दुराग्रह
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अपने अस्थित्व को
बचाए रखने के लिए
आवश्यक है कि
हम अपने
समस्त दुराग्रहों को
त्याग दें वरना
एक समर्थ रचनाकार
बनने की दौड़ में
हम सबसे पीछे
छूट जायेंगे …

(१४.) वक़्त
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वक़्त तेज़ी से
बदल रहा है
लेकिन
बदलते वक़्त में भी
यह समझना
आवश्यक है कि
अपनी जड़ों को
छोड़ देने से
वृक्ष का अस्थित्व
ख़त्म हो जाता है …

(१५.) चाह
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हर तरफ़
अन्धकार व्याप्त है जहाँ,
हमें स्वयं को उसके
अनुरूप ढालना होगा
अन्यथा प्रकाश की चाह हमें
पल-पल, तिल-तिल
गला डालेगी।