गैर बराबरी (गजल)

गजल (बह्र 2122 1122 1122 22)

जख्मे दिल साथ लिए घूमते जाने कितने
चाह समता की लिए आज दिवाने कितने।।

जाति का दंश मुझे आज सताता है बहुत
तोड़ने में हुए है सर्फ़ जमाने कितने।।

देख कर जाति गरीबी नही आती यारो
मेरे हक़ में वो बनाते है बहाने कितने।।

हार कर बैठ न जाना न मिले लक्ष्य अगर
आग में आहुति देते है न जाने कितने।।

जो चढ़ा शीर्ष पे चढ़ता ही गया है अब तक
जो हुआ दौड़ में पीछे सहे ताने कितने।।

कौम है एक हमारी ये हमीं क्यों भूले
एकता पर ही यहाँ गूँजे तराने कितने।।

योग्य गर है तो उसे हक से करे क्यों वंचित
तर्क संगत हो परख बात ये माने कितने।।
!!!!
!!!
सुरेन्द्र नाथ सिंह ‘कुशक्षत्रप’

16 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 07/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 07/09/2016
  2. C.M. Sharma babucm 07/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 07/09/2016
  3. Meena Bhardwaj Meena bhardwaj 07/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 08/09/2016
  4. mani mani 07/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 08/09/2016
  5. Kajalsoni 07/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 08/09/2016
  6. शीतलेश थुल शीतलेश थुल 07/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 08/09/2016
  7. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma (bindu) 07/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 08/09/2016
  8. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 07/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 08/09/2016

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