शांत रहिये पार्ट -2

शांत रहिये, शांत रहिये।
यह शब्द क्यों चुभने लगे है आज कल ,
क्या शांत रहने के लिए ही ,
ईश्वर ने दी थी जुबान।

वैसे तो मैं तुम्हारे कहने पर ,
ज्यादा तर ,शान्त ही हो जाती हूँ ,
मगर कभी कभी मेरा मन ,
विद्रोह भी तो कर बैठता है।

जानती हूँ कि तुम हमेशा ,
मेरे ही हित की सोचते हो ,
मगर कभी कभी तुम्हारा मेरा इस तरह ,
बहुत ज्यादा ख्याल रखना भी खल जाता है.

अच्छा हुआ कि तुम मुझे समय बेसमय ,
शांत करते रहे ,वर्ना मेरे मन के उदगार ,
इस तरह यूँ कविता का रूप कभी नहीं ले पाते,
शायद यह बहुत अच्छा ही हुआ।

अब जब जब तुम मुझे शांत रहने को ,
कहते हो तो मैं तुमसे कुछ भी नही कहती ,
ऊपर से तो विल्कुल शांत ही रहतीं हूँ ,
मगर मन ही मन मुस्कराती हूँ।

ऊपर से तो शांत ही रहतीं हूँ ,
मगर मन ही मन ,एक और नई कविता ,
रचती जाती हूँ या फिर एकबार फिर से ,
और इंतजार करती हूँ जब तुम फिर कहोगे,
” शांत रहिये ”

10 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 07/09/2016
    • Manjusha Manjusha 07/09/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 07/09/2016
    • Manjusha Manjusha 07/09/2016
  3. babucm babucm 07/09/2016
    • Manjusha Manjusha 07/09/2016
    • Manjusha Manjusha 07/09/2016
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 07/09/2016
    • Manjusha Manjusha 07/09/2016

Leave a Reply