जल रहा सिंध, क्या मजबूरी ? खंडित भागों से क्यों दूरी ?

जल रहा सिंध, क्या मजबूरी ?
खंडित भागों से क्यों दूरी ?
होकर अब मुक्त-कंठ रण-शंख
बजा दो, तैयारी पूरी

आओ सीमा के पार चलें
व्याकुल मानवता के हित में
करती है त्राहिमाम अवनी,
निर्मम हत्याएं गिलगित में
है कैद बलूचिस्तान उधर
असुरी शक्ति का साया है
वीभत्स दृश्य का दर्शन है
लाशें लोहू से रंजित में
लाहौर करांची भी जलता
उद्वेलित सबका ही स्वर है
अधिग्रहित हमारा काश्मीर
असुरी चोटों से जर्जर है
है लाल लौह प्रहार करो
अपना ये ठोसित बल लेकर
भूगोल बदल डालो फ़िर से
जब विद्रोहो का ही ज्वर है
सावरकर जी के भारत की
शोषित-इच्छा कर दो पूरी
जल रहा सिंध क्या मजबूरी ————

तमलीन आज दाहिर-धरती
तिल-तिल मरती साँसें भरती
माँ हिंगलाज की छाती पर
ताड़का ताल, नर्तन करती
बचपन भी जहाँ बेदखल है
तरुणाई में भी ना बल है
है प्रौढ़ अवस्था भी घायल
वृद्धावस्था जिन्दा जरती
सुलगा है वो नीला वितान
खुशहाल जहाँ थे विहग प्राण
क्या अहित शौर्य को खोने का ?
इससे अच्छा क्या हो प्रमाण
सबने त्यागा था युद्धों को
अपनाया था बस बुद्धों को
कायरता का चढ़ गया रंग
मिट गया शक्तिशाली निशान
तिब्बत का वो देखो पठार
अक्साई चिन में भी चोरी
जल रहा सिंध क्या मजबूरी ———-

दुश्मन ने यहाँ बिछाई जो
कर दो असफल अब वो बिसात
इस शौर्य ज्योति की रश्मी से
तम में कर दो अरुणिम प्रभात
जब हर इक पन्ना माँ के घर से
बलिदानों का उठे ज्वार
तो मिट जाए पावन भू से
ये कातिल आतंकी जमात
जागो वीरो ना और रहें
खंडित भारत के भुजा-दंड
था बना चितेरा जिसका
चंद्रगुप्त, वो फ़िर से हो अखण्ड
कोई भी ना कर पाए फ़िर से
हिम्मत आँख उठाने की
अभिमान मान-मर्दन होवे
शत्रू का टूटे हर घमंड
खुशियों पर फ़िर ना लगे ग्रहण
हो जाए अमावस्या नूरी
जल रहा सिंध, क्या मजबूरी ?
खंडित भागों से क्यों दूरी ?
होकर अब मुक्त-कंठ रण-शंख
बजा दो, तैयारी पूरी

कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह “आग”
9675426080

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