छप्प्य छंद—कवि: महावीर उत्तरांचली

(१.)
निर्धनता अभिशाप, बनी कडवी सच्चाई
वक्त बड़ा है सख्त, बढे पल-पल महंगाई
पिसते रोज़ ग़रीब, हाय! क्यों मौत न आई
“महावीर” कविराय, विकल्प न सूझे भाई
लोकतंत्र की नीतियाँ, प्रहरी पूंजीवाद की
भ्रष्टतंत्र की बोलियाँ, दोषी कडवे स्वाद की
(२.)
भ्रष्टतंत्र को बदल, मचल मत भ्रष्टाचारी
जनहित में कर काम, कहे जनता यह सारी
कुचल रहे अरमान, कुशासन है बीमारी
कैसा बना विधान, दुखी जनता बेचारी
अच्छी छवि के लोग ही, अब सत्ता में लाइए
लोकतंत्र में आस्था, फिर से आप जगाइए
(३.)
प्रेम प्यार की बात, लगे सबको ही मीठी
प्यार बिना है मित्र, ख़ुशी भी फीकी-फीकी
कानों में दिन-रात, प्रेम की गूंजे सीटी
मन में आठों याम, तुम्हारी मूरत दीखी
कृष्ण बना तो रास रच, बंसी मधुर बजाइए
मीठी वाणी बोलकर, हरदम ही इतराइए
(४.)
सबका बेडागर्क, वर्गभेद ही कर रहा
अमीर करते ऐश, ग़रीब तिल-तिल मर रहा
“महावीर” कविराय, आम आदमी डर रहा
शासक खुद इल्ज़ाम, निज़ाम पे धर रहा
कहते तुलसीदास भी, समरथ को क्या दोष है
जनता तो इक गाय है, ग्वाला तो निर्दोष है
(५.)
“महावीर” यह राष्ट्र, एक स्वर में गाएगा
शिक्षा पर यदि केंद्र, कठोर नीति लाएगा
अमीर-ग़रीब भेद, फिर कहाँ रह पायेगा
यदि शिक्षा का ग्राफ़, एक सा हो जायेगा
भारत को यह विश्व भी, बड़े गर्व से देखता
शिक्षा एक समान यदि, और बढ़ेगी एकता

2 Comments

  1. mani mani 06/09/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 07/09/2016

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