”अखंड भारत ”

”अखंड भारत ”

सोने की चिडीया थी हर डालपर अखंड भारत के काल मे।

कई तुकडो मे बटगया प्यारा देश हमारा इन ढेड सौ साल मे ।

आपस की लडाई थमने का नाम नही अव्वाम पहुंची है बूरे हाल मे।

मासाहार रहगया सोच में पानी ही पानी दिखता है अब दाल मे।

गरीबी भुकमरी की हद होगयी दस परसन वाले जीरहे है थाट मे।

रोटी खाना होगया दुशवार पर डाटा मील रहा है आटे के भाव मे।

मालिक ही दे सहारा अब ,कोई फसगया मुसीबत मे कोई माया जाल मे ।
(आशफाक खोपेकर)
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  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 06/09/2016

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