आधुनिक जीवन (गजल)

गजल (बह्र 1222 1222 122)

ज़माने में नयापन हो गया है
खुला तन एक फैशन हो गया है।।

नही खिदमात होती है बड़ो की
चलन अब ये पुरातन हो गया है।।

नमन बच्चे बडों का भूल बैठे
मिलाना हाथ प्रचलन हो गया है।।

भला कैसे गरीबों का हो जग में
यहाँ सब भ्रष्ट शासन हो गया है।।

मलाई खा रहे कलयुग में पामर
मनुज का मान मर्दन हो गया है।।

लिए मद काम माया क्रोध तृष्णा
मनुज खुद आज रावन हो गया है।।

हरण होता सदाचारों का अब तो
जमाना ही दुशाशन हो गया है।।

बहारें प्यार की जाने कहाँ हैं
चमन में कैसा क्रंदन हो गया है।।

लहू के लोग प्यासे हो रहे हैं
कि खूँ आलूद गुलशन हो गया है।।

उड़ाता हैं धुंए में उम्र को वो
युवा का खोखला तन हो गया है।।

सहारा एक रब का है! वही अब
मेरे सीने का धडकन हो गया है।।
!!!!
!!!!
सुरेन्द्र नाथ सिंह ‘कुशक्षत्रप’

9 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 06/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 06/09/2016
  2. mani mani 06/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 06/09/2016
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 06/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 06/09/2016
  4. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma 06/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 06/09/2016

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