बचा लो बेटियां – धीरेन्द्र

बेटियां

क्यूं मेरे दुनिया में आ जाने से दिक्कत थी तुम्हे
क्यूँ मिटा डाले निशा, और ना मेरी परवाह की |

चीख मेरी ना सुनी, ना दर्द का कोई शिकन
क्यूँ बहा दी रक्त मेरु अस्थियों की धार सी |

मार कर एक लिंग को, क्या है तेरा पौरुष बढ़ा
बेटियों में जन्म लेना क्या यही अपराध थी |

तुमने बोयी हर वो रश्मे, सोच कर अपने लिए
बेटियों को कर के कमतर, जख्म की सौगात दी |

लालची बेशक हो तुम, पर याद ये रखना मगर
बेटों के अपनी दुकान के, होगे तुम्ही खरीदार भी |

गर अभी भी ना रुके तो बात ये सुन लो मेरी
बाग़ तो होंगे मगर, एक ठूँठ की भरमार सी |
– धीरेन्द्र ‘प्रखर’

5 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 06/09/2016
  2. babucm C.m sharma(babbu) 06/09/2016
  3. Kajalsoni 06/09/2016
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 06/09/2016
  5. mani mani 06/09/2016

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