उजड़ी-उजड़ी दिल की बस्ती

उजड़ी-उजड़ी दिल की बस्ती, उजड़ा-उजड़ा तन तरूवर है,
इश्क़ तपस में बिता जीवन, इश्क़ संगीति जीना दुःभर है |
नवल-नवल से शौख़ सिले में, हार-हार तन गया सँवर है,
लुट-लुट के ही ये है जाना, रीता इशक़ हरेक भँवर है |

दो जिसम और एक जान का, लगा हुआ ये जो संगम है
डुबकी-डुबकी किया मार के, मैं से मेरा “मैं” अर्पण है |
निखर मैं जाऊँ इस संगम में, नख-शिख डूबा ये तन-मन है
धुंधला-धुंधला नशा हुआ क्या ? नज़रों को कैसा हुआ वहम है?
साख-साख पे धुंधले सहर सा, छाया भर-भर इश्क़-ए सेहर है |
इश्क़ मिली जो बदनामी है, हमको तो अब तक न खबर है |

जैसे बिखरे हुए गगन में, नज़र से वंचित कोई केहक़श है |
लिख कर नगमे भी कह ना पाऊं, इश्क़ मिला तो यही सबब है
मोह ताप में पिघले-पिघले, भावी जीवन के उत्सव हैं ,
इसी तपन में तप-तप करके, पाया कहने का वैभव है |
पता था पिछला जो मेरे दर्द का, बदला उसने भी नगर है
धारा बन जो मिल मैं गया हूँ, अब चलना सागर के डगर है |

उजड़ी-उजड़ी दिल की बस्ती, उजड़ा-उजड़ा तन तरूवर है,
इश्क़ तपस में बिता जीवन, इश्क़ संगीति जीना दुःभर है |
नवल-नवल से शौख़ सिले में, हार-हार तन गया सँवर है,
लुट-लुट के ही ये है जाना, रीता इशक़ हरेक भँवर है ||||

By Roshan Soni

6 Comments

  1. डॉ. विवेक Dr. Vivek Kumar 05/09/2016
    • roshan soni roshan soni 06/09/2016
  2. C.M. Sharma C.m sharma(babbu) 05/09/2016
    • roshan soni roshan soni 06/09/2016
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 05/09/2016
    • roshan soni roshan soni 06/09/2016

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