सुबह

अंधेरों के गर्भ में पलता
उम्मीद का बीज
सीप में छुपा मोती की तरह
अपने बंधनों को तोड़
बाँहें फैला कर
क्षितिज का सीना चीर
गगन को लहूलुहान बना
अंकुरित होता है
रोशनी का नन्हा पौधा
अग्नि पुष्प खिल रहे हैं जिसमें
लाल साड़ी पहने आती हुई
कोई नववधू हो जैसे
शर्म से रक्तिम है
पूरा वजूद जिसका
धरती अम्बर दर्पण बने
सिर्फ निहार रहे हैं उसे
औऱ वह सत्य का सिपाही
बढे जा रहा है
ज्योति की तलवार लिए
तिमिर के खून से नहा
गगन के एक छोर से दूसरे तक
शांति के श्वेत पुष्प सुगंधित करते
आशा की चादर बिछ गई
प्रतिष्ठित हुआ सत्य का साम्राज्य

5 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 05/09/2016
    • Uttam Uttam 05/09/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 05/09/2016
  3. Kajalsoni 06/09/2016
  4. mani mani 06/09/2016

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