स्पन्दन

प्रिये, स्निग्ध सुधि मेरी
कि मेरे गाल पर अन्कित
तुम्हारा प्रथम चुम्बन

मेरे पार्श्व मे बैथी
तुम शाद्वल के बिच्हौने मे
चपल अधरो मे लेकर
सिन्धु सम प्यर
मधु सा
तुम्हारा आलिन्गन
प्रिये, स्निग्ध सुधि मेरी
कि मेरे गाल पर अन्कित
तुम्हारा प्रथम चुम्बन

निमिश उन्मीलित नयनो से
रजत स्वप्नो का अवलोकन
नदी कि गोद मे जल सा
समर्पन
एक पल का
हताकर अवगुन्थन
प्रिये, स्निग्ध सुधि मेरी
कि मेरे गाल पर अन्कित
तुम्हारा प्रथम चुम्बन

तुम्हरि सान्सो का सौरभ
पिया पुश्पो ने उस पल
प्रभन्जन प्यार क लेकर
सुगन्धित कर दिया तुमने
उम्र के एक पल को
हिय क विजन वन
प्रिये, स्निग्ध सुधि मेरी
कि मेरे गाल पर अन्कित
तुम्हारा प्रथम चुम्बन

तितिक्श है तुमुल
हिय मे
प्रतीक्शा है शाश्वत
युगो से जी रहा हू मै
बसाये निस्प्रान जीवन मे तुम्हारा स्पन्दन
प्रिये, स्निग्ध सुधि मेरी
कि मेरे गाल पर अन्कित
तुम्हारा प्रथम चुम्बन

अम्बिकेश

3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 05/09/2016
  2. babucm C.m sharma(babbu) 05/09/2016
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 05/09/2016

Leave a Reply