पूरी जंगल मेरी चाह- आशीष भारद्वाज

बड़ी उम्मीदों के साथ
निकले थे हम
कुछ अरमां कुछ सपनें लिए
दूर तलक चलते रहे
अपनी आसमां को ढूंढते हुए
अंधेरों से आगे बढ़ते हुए
रौशनी से गुजरते हुए
फूलों को महकते हुए
काटों पे पग धरते हुए
शहर पार करते हुए
गाँव गाँव भटकते हुए
कभी तेज चलते हुए
कभी ठहरते रुकते हुए
मीठे सुखे फल चबाते हुए
कूपों पर प्यास बुझाते हुए
मन के तराने गुनगुनाते हुए
औरों को गाते गंवाते हुए
तरु-छाया में आराम फरमाते हुए
भरी दोपहरी दिनकर से नैन मिलाते हुए
पहाड़ों की चढ़ाई नापते हुए
गर्तों की गहराइ लांघते हुए
हवा से तन सहलाते हुए
बारिश से मन भिंगाते हुए
गाते हुए गुनगुनाते हुए
दर्द से कभी कराहते हुए
कुछ को भूलते भूलाते हुए
कुछ को यादों में सजाते हुए
चलते हुए चलाते हुए
कभी डमरू बजाते हुए
नाचते हुए नचाते हुए
भोले की धुनी रमाते हुए
लोगों की कहानी सुनते हुए
अपनी कहानी सुनाते हुए
प्रकृति के रंगों में समाते हुए
ह्रदय में सब कुछ बसाते हुए
दूर तलक जब में पंहुचा
उस फलक तक जब में पंहुचा
वो जो अरमां लेके चला था
वो जो सपने सजाके चला था
बदले बदले से थे मेरे मिजाज
रही नहीं थी कोई अरमां
किसी भी सपने को पाने की
मुझे हो गया था राहों से प्यार
जंगल नदियां चौराहों से प्यार
हर डाल मुझे अच्छी लगने लगी
कोई भी पती नहीं लगती बेगानी सी
हर पेड़ ही मेरी अब चाहत थी
हर पेड़ पर मुझको अब राहत थी
बची नहीं थी अब ये छोटी चाह
एक सुन्दर सा घोंसला सजाने की

3 Comments

  1. C.M. Sharma C.m sharma(babbu) 04/09/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 04/09/2016
  3. Bittu 18/09/2018

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