प्यारी आउ छात पै निहारि नए कौतुक

प्यारी आउ छात पै निहारि नए कौतुक ये,
घन की छटा तें खाली नभ में न ठौर हैं।

टे, सूधी, गोल औ चखूंटी, बहु कौनवारीं,
खाली, लदी, खुली, मुंदी, करैं दौरादौर हैं॥

‘ग्वाल कवि कारी, धौरी, घुमरारी, घहरारी,
धुरवारी, बरसारी झुकी तौरातौर हैं।

ये आईं, वो आईं, ये गईं, वो गईं,
और ये आईं, उठी आवत वे और हैं॥

और विष जेते, तेते प्राण के हरैया होत,
वंशी के ककी कभू जात न लहर है।

सुनते ही एक संग, रोम रोम रचि जाय,
जीय जारि डारै, पारै बेकली कहर है॥

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