भाव भ्रमण

‘ मुझमेँ दुःख का संसार बसा करता है
माया मेँ मन लाचार फँसा करता है,
हूँ चढ़ा रहा नित अश्रुमाल मैँ जिस पर –
वह भी मुझसे हर बार हँसा करता है ….

भूलोँ पर भी मैँ भूल किया करता हूँ
आघातोँ पर मैँ धूल दिया करता हूँ
मेरे पथ मेँ जो शूल निरंतर बोते-
उनको भी मैँ मृदु फूल दिया करता हूँ।

असह्य वेदना भार लिए फिरता हूँ
उर मेँ अगणित उद्गार लिये फिरता हूँ,
मेरे उपवन जो लूट दे रहे पतझड़- उनको भी मधुमास दिया करता हूँ।

जय हिंद! !!

———————————कवि आलोक पान्डेय

3 Comments

  1. बगहा कपटी 04/09/2016
  2. C.M. Sharma C.m sharma(babbu) 04/09/2016
  3. आलोक पान्डेय आलोक पान्डेय 04/09/2016

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