**एक पुरानी नज़्म::Er Anand Sagar Pandey**

एक बहुत पुरानी लेकिन अज़ीज क़ाफियामय नज़्म-

212 212 212 212

**मुझे आज मुझको मना लेने दे**

मुझको बिछड़े हुए मुझसे मुद्दत हुई,
आज सीने से खुद को लगा देने दे,
ख्वाब अब भी मेरी आंख में कैद हैं,
मेरी नींदों को मुझको मना लेने दे l

आंख दरिया रही एक मुद्दत तलक़,
एक मुद्दत से लब पर रही सिसकियां,
तेरी यादों में अब तक बहुत रो चुका,
तू मुझे आज बस मुस्कुरा लेने दे l

मैने मांगा है कब कुछ वफ़ा का सिला,
मैंने कब तुझसे जख्मों के मरहम लिये,
तू सुने ना सुने तेरी मर्जी है ये,
हाले-दिल आज मुझको सुना लेने दे l

उम्र खोयी बहुत आरजू में तेरी,
खुद तमाशा भी खुद को बनाया यहां,
अब बहुत गिर चुका मैं तेरी राह में,
तू मुझे आज मुझको उठा लेने दे l

तुझको जाना है जा मैंने रोका कहां,
ज़िन्दगी मेरी रोई अलग बात है,
पर बहुत रो चुकी मेरी उम्र-ए-रवां,
अहले-धड़कन को अब मुस्कुरा लेने दे ll

@Copyright.

-Er Anand Sagar Pandey

7 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 03/09/2016
  2. Saviakna Savita Verma 04/09/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 04/09/2016
  4. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 04/09/2016
  5. babucm C.m sharma(babbu) 04/09/2016
  6. Kajalsoni 04/09/2016
  7. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 04/09/2016

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