कोई मिल गया जो अपना सा है

कोई मिल गया जो अपना सा है

कोई मिल गया जो अपना सा है
लगता है हकीकत पर सपना सा है
कुछ अनकही बातें जो सुन भी लेता है
जो अनायास अहसास के पल भी देता है
जो सब कुछ जानकर भी अनजान है
जो रहता है बाहर पर भीतर भी मेहमान है
जो झुकी झुकी पलकों से देता पैगाम
जिसका होता आगाज नहीं होता अंजाम
जिसका केवल आभास है जो कल्‍पना में रहता है
जो सबकुछ कहकर भी कुछ नहीं कहता है
जो अध्‍यात्‍म पथ पर भी बडी शान से चलता है
ऐसा दीपक है जो बिना बाती के जलता है
जो दुनियां की झकडनों की नहीं करता परवाह
जिसके हृदय की गहराई की नहीं ली जा सकती थाह
उसकी अनुभूति हर ठौर हर जगह पर है
जो मिल जाता सर्वत्र उसका अहसास अगर है
उसमें हिमालय की शीतलता उसमें रेगिस्‍तान का तपना सा है
कोई मिल गया जाेे अपना सा है
लगता है हकीकत पर सपना सा है

रामगोपाल सांखला ”गोपी”

3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 03/09/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 03/09/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 03/09/2016

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