संध्या

संध्या

उजियारे अंधियारे ने
लेकर अपने आगोश में
प्रकृति पर ये थोंप दिया
काले रंग से तन पोत दिया ।
सारे वस्त्र ओर चेहरा
दिन के हंसी उजाले में
रहता है यूं खिला-खिला
मगर सांझ ने ढलकर इसको
कुरूप सा जैसे बना दिया।
प्रकृति पर ये थोंप दिया
काले रंग से तन पोत दिया ।
तन कंपित मन में हलचल
होंठों पर खुशी, घुमे मन अविचल
लेकर तन में नई उमंग
ओर लेकर नई स्फुर्ति
चाहत का दीया जला दिया।
प्रकृति पर ये थोंप दिया
काले रंग से तन पोत दिया ।
-ः0ः-

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