हुजूम इक कारवां

sheethujum
एक हुजूम सा चल पड़ा है तेरे पीछे पीछे
अख्ज़-अर्जमन्द, अऱ्ज पे फिर गले मिले है अजनबी जैसे ,
आज़र्दाह है कोई तो कोई है आवारा
आब-ए-आईना में आब-ए-चश्म किसी का हो जैसे ,
आंधी की आफत से आफ़ताब आबरू खो रहा है पीछे पीछे ,
आख़िर आक़िबत से आजिज़ और आज़िम अनजान हो जैसे ,
आदिल का आदाब और आदमी की आदमियत अब तलक साथ है ,
आब-ए-तल्ख़ पे आबाद आयन्दा की आरज़ू में उलझा है पीछे पीछे ,
आश्ना की आराईश को देख आशिक़ भी आशियाना बनाने में है मशरूफ ,
आलिम-आली आलाप करते आलम बना रहे है तेरे पीछे पीछे ,
आसमान का आफताब भी आशुफ़्ता सा है आसिम-आसीन को अजीज देख,
आहिस्ता- आहिस्ता आसूदाह भी आसरा ले रहा है तेरे पीछे पीछे ,
अजब सा मंजर है अजीब सा अफ़स़ना,
अत्त्फ़ाल का भी खेल अज़ल चल रहा हो जैसे ,
तेरी अदा का अत्फ़ अब अदा करना हो गया नामुमकिन,
अज़ीम- अदीब की अदालत में अब्तर हो गया तेरे पीछे पीछे ,
अब्र की अब्सार अफ़सुर्दा सी लग रही है ,
अब्द भी अज़ाब झेल रहा हो जैसे ,
असीर-अस्हाब साथ चल रहे है पीछे पीछे ,
अर्श का अरमान दिल में लिये अस्क़ाम का असर छोड़ जा रहा है ,
अस्ल की असास भी डगमगा गयी पीछे पीछे..

शीतलेश थुल !!

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